अध्यात्म

जीवन में सुख-शांति पाने के लिए दूसरों की बुराई पर नहीं, अच्छाई पर ध्यान दें

प्राचीन कथा के अनुसार एक व्यक्ति हमेशा लोगों के बारे में बुरा ही सोचता था। इसे अपना पड़ोसी भी बिल्कुल पसंद नहीं था। जिसके कारण ये उसकी बुराई हर किसी से किया करता था। मन में लोगों को प्रति इतनी जलन व नफरत होने के कारण ये सदा अशांत ही रहता था। एक दिन ये व्यक्ति मंदिर गया और भगवान से शिकायत करने लगा। इस व्यक्ति ने भगवान से कहा कि आपने मेरे जीवन में सुख-सुविधाएं क्यों नहीं लिखी हैं। मेरा पड़ोसी हमेशा खुश रहता है और मेरा मन हमेशा अशांत। मेरे साथ ऐसा क्यों हो रहा है।

ये सब सुनने के बाद भगवान इस व्यक्ति के सामने प्रकट हुए। भगवान ने व्यक्ति से पूछा आखिर तुम चाहते क्या हो। इसने कहा कि आपने मेरी किस्मत मेरे पड़ोसी जैसी क्यों नहीं लिखी है। उसके पास जो कुछ भी है वो मेरे पास क्यों नहीं है। ये बात सुनने के बाद भगवान ने दो थैले इसके सामने प्रकट किए। जिसमें से एक थैले में पड़ोसी की बुराइयां थी और दूसरे थैले में उसकी अच्छाई।

भगवान ने व्यक्ति से कहा कि इसमें से तुम एक थैली अपने गले व दूसरी अपनी पीठ पर टांग लों। इन दोनों थैली में से तुम एक थैली को ही खोलकर देख सकते हों। ऐसा करने से तुम्हारे जीवन में भी शांति आ जाएगी। व्यक्ति ने दोनों थैले उठाए और ये सोच में पड़ गया कि वो किस थैली को अपने गले और पीठ में टांगें। व्यक्ति ने काफी विचार किया और फिर तय किया की वो पड़ोसी के बुराई वाली थैली अपने गले में टांगेगा। जबकि अच्छाई वाली थैली अपनी पीठ पर।

थैली को टांगने के बाद ये व्यक्ति अपने घर चले गया और रोज अपने पड़ोसी की बुराई वाली थैली को खोलकर देखने लगा। जो भी बुराई इसे अपने पड़ोसी की पता चलती वो गांव में जाकर हर किसी को बता देता। ऐसे करते हुए कई दिन बीत गए और इसका मन और अशांत होने लगा। मन अशांत होने पर ये फिर मंदिर गया और भगवान के सामने हाथ जोड़कर कहने लगा। आपने कहा था कि थैली टांगने से मेरे जीवन की परेशानी खत्म हो जाएंगी और मैं शांत रहने लगूंगा। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ।

मेरा मन पहले से ओर ज्यादा अशांत रह रहा है। आखिर मेरे साथ ये सब क्यों हो रहा है। भगवान इस व्यक्ति के सामने प्रकट हुए और इससे कहा कि जब तुम पहली बार मंदिर आए तब भी तुमने यहीं कहा था कि तुम्हारा मन अशांत है। तुम्हारे मन के अशांत होने की वजह तुम खुद थे। क्योंकि तुम हर वक्त अपने पड़ोसी की बुराई करते थे और इसकी अच्छाई को नहीं देखते थे। इसलिए मैंने तुम्हें दो थैली दी थी। जिसमें से एक में उसकी इच्छाई थी। लेकिन तुमने उस थैली को गले के आगे टांगने की जगह पीछे टांग दिया। क्योंकि तुम अपने पड़ोसी की केवल बुराई के बारे में ही जाना चाहते  थे।

रोज अपने पड़ोसी की बुराई देखने से तुम्हारी अशांति ओर बढ़ने लगी। लेकिन फिर भी तुमने बुराइयों को देखना बंद नहीं किया और उसके अच्छाई का थैला नहीं खोला। दूसरों की बुराई करने के कारण ही तुम अशांत हो। अगर तुम जिंदगी में तरक्की पाना चाहते हो और शांत रहना चाहते हो। तो तुमें ओरों की बुराई से ज्यादा उनकी अच्छाई पर ध्यान देने चाहिए। क्योंकि जो लोग अच्छाइयों पर ध्यान देते हैं, वो सदा खुश रहते हैं। सुख-शांति के लिए दूसरों की बुराई पर नहीं, अच्छाई पर ध्यान देना शुरू कर दो। व्यक्ति को भगवान की बात समझ आ गई और उसने अपनी गलती मान ली।

कथा से मिली सीख– अगर जीवन में कामयाब और सुखी रहना चाहते हो, तो ओरों की अच्छाइयों पर ही ध्यान दें

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